India-EU Free Trade Agreement 2026: ‘Mother of All Deals’ से भारत को क्या फायदा होगा?
भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) के बीच प्रस्तावित Free Trade Agreement (FTA) को “Mother of All Deals” इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि यह समझौता भारत की अब तक की सबसे बड़ी, सबसे व्यापक और सबसे रणनीतिक व्यापारिक पहल मानी जा रही है, जिसकी बातचीत करीब दो दशकों से चल रही है और जो अब अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी है; इस समझौते के लागू होने से भारत को 27 यूरोपीय देशों के उस विशाल बाजार तक सीधी और आसान पहुँच मिलेगी, जहाँ 45 करोड़ से अधिक उपभोक्ता, उच्च क्रय-शक्ति, अत्याधुनिक तकनीक और वैश्विक सप्लाई-चेन का मजबूत नेटवर्क मौजूद है, जिससे भारतीय उत्पादों और सेवाओं को न केवल नई पहचान मिलेगी बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी भी बनेंगे, क्योंकि FTA के तहत आयात-निर्यात पर लगने वाली भारी कस्टम ड्यूटी और टैरिफ में बड़ी कटौती या पूरी तरह समाप्ति की व्यवस्था होगी, जिसका सीधा फायदा भारत के टेक्सटाइल, गारमेंट, जेम्स-ज्वेलरी, फार्मा, मेडिकल डिवाइस, इंजीनियरिंग गुड्स, ऑटो कंपोनेंट्स, आईटी और प्रोफेशनल सर्विस सेक्टर को मिलेगा, वहीं निर्यात बढ़ने से देश में उत्पादन क्षमता का विस्तार होगा, नई फैक्ट्रियाँ लगेंगी, MSME सेक्टर को मजबूती मिलेगी और लाखों नए रोजगार पैदा होने की संभावना बनेगी; यह डील केवल व्यापार तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें निवेश, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, रिसर्च सहयोग, ग्रीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल, सेमीकंडक्टर और डिजिटल इकोनॉमी जैसे भविष्य के क्षेत्रों में साझेदारी भी शामिल है, जिससे भारत की औद्योगिक क्षमता और नवाचार शक्ति को जबरदस्त बढ़ावा मिल सकता है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है, अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाने और चीन के साथ बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण विश्व व्यापार में अनिश्चितता बनी हुई है, ऐसे में भारत-EU FTA को भारत की Plan-B रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य अमेरिका और चीन जैसे सीमित बाजारों पर निर्भरता कम करना, सप्लाई-चेन को विविध बनाना और भारत को एक भरोसेमंद Global Manufacturing Hub के रूप में स्थापित करना है, क्योंकि यूरोपीय कंपनियाँ अब China+1 Strategy के तहत चीन के विकल्प तलाश रही हैं और भारत उनके लिए सबसे मजबूत दावेदार बनकर उभरा है; हालांकि इस ऐतिहासिक समझौते के रास्ते में कुछ बड़ी चुनौतियाँ भी हैं, जैसे कृषि और डेयरी सेक्टर, जहाँ भारत अपने किसानों और घरेलू उद्योग की सुरक्षा को लेकर सतर्क है, वहीं EU अपने उत्पादों के लिए अधिक बाजार पहुँच चाहता है, इसके अलावा EU का Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) यानी कार्बन टैक्स भी भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे कार्बन-इंटेंसिव इंडस्ट्री की लागत बढ़ सकती है, फिर भी दोनों पक्ष संतुलन बनाकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं; यदि यह समझौता 2026 में घोषित होकर 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक लागू हो जाता है, तो यह भारत की आर्थिक कूटनीति, वैश्विक छवि और दीर्घकालिक विकास के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है, क्योंकि इससे न केवल निर्यात और निवेश को नई गति मिलेगी बल्कि भारत वैश्विक व्यापार संतुलन में एक मजबूत, आत्मनिर्भर और निर्णायक शक्ति के रूप में उभरेगा, और इन्हीं सभी व्यापक आर्थिक, रणनीतिक और भू-राजनीतिक प्रभावों के कारण भारत-EU Free Trade Agreement को सही मायनों में “Mother of All Deals” कहा जा रहा है।
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