किसानों की रोज़ी-रोटी बनाम ट्रेड डील! भारत-अमेरिका कृषि विवाद की पूरी रिपोर्ट
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर इन दिनों सबसे बड़ा विवाद कृषि और डेयरी सेक्टर को लेकर सामने आया है, क्योंकि ये दोनों क्षेत्र भारत की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना से सीधे जुड़े हुए हैं। अमेरिका चाहता है कि भारत अपने कृषि और डेयरी उत्पादों पर लगाए गए ऊँचे आयात शुल्क (टैरिफ) को कम करे, ताकि अमेरिकी कृषि उत्पाद जैसे मक्का, सोयाबीन, गेहूं, सेब, बादाम और डेयरी उत्पाद जैसे दूध पाउडर, चीज़ और बटर भारतीय बाजार में आसानी से प्रवेश कर सकें, लेकिन भारत सरकार इस मांग को लेकर बेहद सतर्क है। भारत में कृषि सिर्फ एक व्यवसाय नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का साधन है, जहां लगभग 60 प्रतिशत आबादी खेती और उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है, वहीं डेयरी सेक्टर में करीब 8 करोड़ छोटे किसान और पशुपालक जुड़े हुए हैं, जो रोजाना 1–2 गाय या भैंस के दूध से अपना घर चलाते हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और यहां का डेयरी मॉडल बड़े कॉरपोरेट्स पर नहीं बल्कि सहकारी समितियों और छोटे किसानों पर आधारित है, जैसे अमूल मॉडल, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है। भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पाद भारी सरकारी सब्सिडी और अत्याधुनिक तकनीक के कारण बहुत सस्ते होते हैं, और यदि भारत ने अपने बाजार खोल दिए तो सस्ते विदेशी उत्पाद भारतीय बाजार में भर जाएंगे, जिससे घरेलू किसानों को अपनी फसल और दूध कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा और उनकी आय में भारी गिरावट आ सकती है। खासकर डेयरी सेक्टर में यह खतरा और भी गंभीर है, क्योंकि दूध की कीमतों में थोड़ी सी गिरावट भी लाखों ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर सकती है। इसके अलावा, भारत के लिए यह मामला केवल आर्थिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक भी है, क्योंकि अमेरिका में डेयरी पशुओं को कई बार animal-based feed दिया जाता है, जिसे भारत में उपभोक्ता धार्मिक और सांस्कृतिक कारणों से स्वीकार नहीं करते, और भारत सरकार ऐसे उत्पादों को बिना सख्त नियमों के अनुमति नहीं देना चाहती। खाद्य सुरक्षा भी इस विवाद का एक अहम पहलू है, क्योंकि भारत अपनी आबादी के लिए आत्मनिर्भर खाद्य प्रणाली बनाए रखना चाहता है और यदि कृषि आयात पर निर्भरता बढ़ती है तो भविष्य में कीमतों में अस्थिरता और घरेलू उत्पादन में गिरावट का खतरा पैदा हो सकता है। इन्हीं कारणों से भारत सरकार ने कृषि और डेयरी सेक्टर को “रेड लाइन” घोषित किया है और साफ कहा है कि किसी भी ट्रेड डील में इन संवेदनशील क्षेत्रों के साथ समझौता नहीं किया जाएगा। हालांकि, अमेरिका का तर्क है कि भारत जैसे बड़े बाजार में पहुंच मिलने से दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन सुधरेगा और उपभोक्ताओं को सस्ते उत्पाद मिलेंगे, लेकिन भारत का मानना है कि सस्ते आयात का लाभ अल्पकालिक हो सकता है, जबकि किसानों को होने वाला नुकसान दीर्घकालिक और गहरा होगा। इस ट्रेड डील को लेकर किसान संगठनों ने भी चिंता जताई है और मांग की है कि कृषि और डेयरी को किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते से पूरी तरह बाहर रखा जाए, क्योंकि पहले भी वैश्विक बाजार के दबाव ने किसानों को नुकसान पहुंचाया है। सरकार का कहना है कि ट्रेड डील का फोकस औद्योगिक उत्पादों, टेक्नोलॉजी, रक्षा, फार्मा और गैर-संवेदनशील क्षेत्रों पर रहेगा, जबकि कृषि और डेयरी में देशहित और किसान हित को सर्वोपरि रखा जाएगा। कुल मिलाकर, भारत-अमेरिका ट्रेड डील में कृषि और डेयरी को लेकर विवाद इस बात का प्रतीक है कि भारत आर्थिक विकास के साथ-साथ अपने किसानों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करना चाहता, और यही कारण है कि यह मुद्दा केवल व्यापार समझौते तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय हित और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा बड़ा विषय बन गया है।

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