चीन – आर्थिक मोर्चे पर नई पहल
वैश्विक अर्थव्यवस्था में लंबे समय से केंद्रीय भूमिका निभाने वाला चीन इन दिनों विकास दर में आई नरमी, रियल एस्टेट सेक्टर की चुनौतियों, घरेलू मांग में गिरावट, युवाओं के बीच बढ़ती बेरोजगारी और बाहरी व्यापारिक दबावों जैसी कई जटिल परिस्थितियों से एक साथ जूझ रहा है, और इन्हीं हालात के बीच सरकार ने अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार देने, निवेशकों का विश्वास लौटाने तथा उत्पादन गतिविधियों को तेज करने के उद्देश्य से बहुआयामी आर्थिक पहलों का संकेत दिया है जिनका प्रभाव न केवल देश के भीतर बल्कि एशिया, यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका तक महसूस किया जा सकता है; नीति निर्माताओं की प्राथमिकता स्पष्ट रूप से यह दिखती है कि वे पारंपरिक इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च को आधुनिक औद्योगिक रणनीति के साथ जोड़ते हुए हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ग्रीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल सप्लाई चेन और डिजिटल कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाना चाहते हैं, साथ ही छोटे और मध्यम उद्यमों को टैक्स राहत, आसान कर्ज और निर्यात प्रोत्साहन देकर रोजगार सृजन की नई लहर पैदा करने की कोशिश की जा रही है; बीते कुछ वर्षों में वैश्विक कंपनियों द्वारा सप्लाई चेन विविधीकरण की रणनीति अपनाने से चीन के निर्यात प्रभुत्व को चुनौती मिली है, इसलिए नई पहलों के तहत लॉजिस्टिक नेटवर्क, बंदरगाह क्षमता, फ्री ट्रेड जोन और सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को और अधिक कुशल बनाने पर जोर दिया जा रहा है ताकि विदेशी निवेशकों को यह संदेश दिया जा सके कि चीन अब भी बड़े पैमाने पर उत्पादन, कुशल श्रम और तेज डिलीवरी का सबसे भरोसेमंद केंद्र बना हुआ है; सरकार वित्तीय क्षेत्र में भी तरलता बढ़ाने, ब्याज दरों को अनुकूल बनाए रखने और हाउसिंग मार्केट को स्थिर करने के विकल्पों पर काम कर रही है क्योंकि संपत्ति क्षेत्र की कमजोरी का सीधा असर उपभोक्ता भरोसे और बैंकिंग प्रणाली पर पड़ता है, और यदि लोग अपने घरों की कीमतों को लेकर आश्वस्त नहीं होते तो वे खर्च कम कर देते हैं जिससे समग्र मांग प्रभावित होती है; उपभोक्ता खर्च को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय प्रशासन को प्रोत्साहन पैकेज, सब्सिडी योजनाएँ, डिजिटल कूपन और ग्रामीण बाजारों में ई-कॉमर्स विस्तार जैसे उपाय सुझाए जा रहे हैं, ताकि विकास का लाभ बड़े शहरों से बाहर भी पहुंचे और आय असमानता घटे; ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन बनाना भी नई आर्थिक सोच का हिस्सा है, इसलिए सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं, बैटरी तकनीक तथा स्वच्छ परिवहन में भारी निवेश की संभावनाएँ जताई जा रही हैं, जिससे चीन एक ओर कार्बन उत्सर्जन घटाने का दावा मजबूत कर सके और दूसरी ओर भविष्य की उद्योगिक प्रतिस्पर्धा में अग्रणी भूमिका निभा सके; अंतरराष्ट्रीय बाजारों की नजर इस बात पर भी है कि ये नीतियाँ विदेशी कंपनियों के लिए नियामकीय माहौल को कितना पारदर्शी बनाती हैं, क्योंकि हाल के वर्षों में डेटा सुरक्षा, टेक कंपनियों पर नियंत्रण और भू-राजनीतिक तनावों ने निवेश निर्णयों को प्रभावित किया है, ऐसे में यदि नियम स्पष्ट और स्थिर दिखते हैं तो पूंजी प्रवाह फिर से बढ़ सकता है; एशियाई पड़ोसी देशों के लिए यह विकास इसलिए अहम है क्योंकि वे कच्चे माल, पुर्जों और मध्यवर्ती वस्तुओं की सप्लाई में चीन पर निर्भर हैं, इसलिए वहां उत्पादन बढ़ने का मतलब उनके निर्यात अवसर भी बढ़ना हो सकता है, वहीं प्रतिस्पर्धा के कारण कुछ देशों पर दबाव भी आ सकता है; मुद्रा बाजार, कमोडिटी कीमतें और शेयर बाजार इन संकेतों पर तेजी से प्रतिक्रिया दे रहे हैं, निवेशक हर नई घोषणा को इस नजर से देख रहे हैं कि क्या यह अस्थायी प्रोत्साहन है या लंबी अवधि की संरचनात्मक सुधार प्रक्रिया की शुरुआत; कई अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि केवल सरकारी खर्च बढ़ाने से स्थायी समाधान नहीं निकलेगा, बल्कि उत्पादकता सुधार, निजी क्षेत्र का भरोसा, नवाचार की स्वतंत्रता और वैश्विक साझेदारियों का विस्तार भी उतना ही जरूरी है, इसलिए आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि घोषित योजनाएँ जमीन पर कितनी तेजी से उतरती हैं; यदि ये पहल सफल होती हैं तो चीन फिर से उच्च विकास पथ पर लौट सकता है, वैश्विक मांग को सहारा मिल सकता है और महामारी के बाद की आर्थिक अनिश्चितताओं में कमी आ सकती है, लेकिन यदि चुनौतियाँ बनी रहती हैं तो दुनिया भर की सप्लाई चेन, व्यापार संतुलन और निवेश प्रवाह पर इसका असर जारी रहेगा; कुल मिलाकर, यह समय चीन की आर्थिक दिशा तय करने वाला माना जा रहा है, जहां नीति, बाजार और भू-राजनीति तीनों मिलकर भविष्य की तस्वीर बनाएंगे और पूरी दुनिया इस बदलाव को बहुत ध्यान से देख रही है।
.jpeg)
Social Plugin